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डॉ. दिलीप कुमार सिंह पद्मश्री से हुए सम्मानित

लाखों गरीबों का मुफ्त में इलाज करने वाले ‘गॉड फादर’ के नाम से मशहूर (Dr. Dilip Kumar Singh) डॉ. दिलीप कुमार सिंह पद्मश्री से हुए सम्मानित, इनकी सेवाभाव को देख आप भी हो जाएंगे हैरान

डॉक्टर को भगवान का रूप ऐसे ही नहीं कहा जाता। इस दुनिया में कई ऐसे लोग हैं जो बिना किसी स्वार्थ के अपना संपूर्ण जीवन लोगों की सेवा करने में लगा देते हैं। इन्हीं महान लोगों में से एक हैं बिहार के भागलपुर के रहने वाले डॉ. दिलीप कुमार सिंह। जिन्हें गॉड फादर भी कहा जाता है। जिस समय में ज्यादातर डॉक्टर शहर में रहकर प्रैक्टिस करना पसंद करते हैं उस समय दिलीप कुमार सिंह ने अपने गांव को ही अपने कार्यस्थल के रूप में चुना।

93 साल के हो चुके डॉ. दिलीप कुमार सिंह आज भी मरीजों का ईलाज करते हैं। वो लाखों मरीजों का मुफ्त में ईलाज कर, उनकी सहायता कर चुके हैं। यही कारण है कि गरीबों और बेसहारा लोगों के मसीहा कहे जाने वाले डॉ. दिलीप कुमार सिंह को भारत सरकार ने देश के सर्वोच्च सम्मान में से एक पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया है।

डॉ. दिलीप कुमार सिहं के लिए गॉड फादर कहलाने के पीछे एक प्रेरणादायक कहानी छिपी है। आइए जानते हैं उनके जीवन का संघर्ष और सफलता का सफर।

Dr. Dilip Kumar Singh ने 93 साल की उम्र में भी नहीं छोड़ा मरीजों को देखना

भागलपुर में पीरपैंती प्रखंड के डॉक्टर दिलीप कुमार सिंह अपने काम के प्रति कितने ईमानदार है इस बात का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि 93 साल की उम्र में भी वो लोगों की सेवा करते हैं। 93 वर्षीय डॉ. दिलीप कुमार सिंह ने तकरीबन 68 साल में लाखों गरीबों का मुफ्त ईलाज किया है। आज भी वह मरीजों को देखते हैं।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन भागलपुर (IMA Bhagalpur) के ‘गॉड फादर’ रहे डॉ. सिंह ने गरीबों और बेसहारों को जीवनदान देने के लिए डॉक्टरी के पेशे को अपनाया था।

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पोलियों के ईलाज में भी ने दिया है अहम योगदान

26 जून 1926 को बांका में जन्में डॉ दिलीप कुमार सिंह की शुरुआती पढ़ाई पीरपैंती से ही हुई थी। हाईस्कूल की पढ़ाई उन्होंने भागलपुर से की। फिर पटना मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई 1952 में पूरी की थी। इसके बाद इंग्लैंड से इन्होंने डीटीएम एंड एच किया है। 1953 में भागलपुर के कई प्रखंडों में कोलरा फैला तो इसके इलाज में ये काफी एक्टिव रहे। देश में पोलियो के इलाज को लेकर भी इनका अहम योगदान माना जाता है। गांव में दो पोलियो के मरीज मिलने के बाद उन्होंने अपने खर्च पर विदेश से ग्यारह सौ फाइल पोलियो की दवा मंगाई। फिर गांव-गांव में घूमकर बच्चों को दवा पिलाई।

हालांकि, उनके इस जज्बे को देखकर आइएमए बुक ऑफ रिकार्ड और लिमका बुक ऑफ रिकार्ड में उनका नाम दर्ज हुआ। गांव में बिजली नहीं रहने के कारण बड़ी समस्या खड़ी हो रही थी, लेकिन गरीब लोगों का सस्ता इलाज और जिनके पास रुपये नहीं थे उनका मुफ्त में इलाज करने का काम शुरू किया।

संघर्ष में भी नहीं मानी हार

डॉ. दिलीप सिंह केवल चिकित्सा के क्षेत्र में ही अपने द्वारा किए गए कार्यों के लिए प्रसिद्ध नहीं है बल्कि अपने हाईस्कूल की पढ़ाई के दौरान वो आजादी की लड़ाई में भी शामिल हुए थे। इंटर की पढ़ाई के दौरान उनकी उम्र करीब 19 साल की थी। उस समय मां का साथ छूट गया। वहीं, जब 27 साल के हुए तो पिता का भी साया उठ गया। परिवार में बड़ा होने के नाते परिवार की सारी जिम्मेदारियां उन्हीं के कंधों पर आ गईं, लेकिन उन्होंने अपने छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी उठाने के साथ ही अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। खुद को मुकाम पर पहुंचाया और भाई और बहनों को को भी पढ़ा-लिखाकर अच्छा इंसान बनाया और, लोगों का उपचार भी उन्होंने जारी रखा।

देश की सेवा करने के लिए छोड़ दी अमेरिका की नौकरी

डॉ. दिलीप कुमार सिंह (Dr. Dilip Kumar Singh) ने 1952 में पटना मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई खत्म करने के बाद अमेरिका भी गए। वहां कुछ दिनों तक उन्होंने नौकरी की, लेकिन उनका मन वहां नहीं लगा। क्योंकि उनके मन में अपने देश की सेवा करने का जुनून सवार था। देश की सेवा करने के जज्बे ने उन्हें वहां से लौटने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद वह सीधे अपने गांव पीरपैंती लौट आए और गरीबों का इलाज करना शुरू कर दिया।

हालांकि, जिस दौर में उन्होंने इलाज करना शुरू किया था, उस समय छुआछूत जैसी सामाजिक बुराई चरम पर थी। दौर वो था जब न सड़क थी, न बिजली थी और न ही टेलीफोन की सेवा। जिस किसी गांव से मरीज की सूचना आती थी तो वे उस गांव में जाकर इलाज करते थे। यदि रात हो गई तो दिया जलाकर इलाज करते थे।

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सरकार ने किया पद्मश्री सम्मान से सम्मानित

चिकित्सीय सेवा में बेहतर कार्य के लिए भारत सरकार ने Dr. Dilip Kumar Singh को पद्मश्री (Padma Shri) सम्मान से नवाजा है। 93 वर्षीय डॉ. दिलीप ने हमेशा गरीबों और बेसहारा लोगों की जिंदगी रोशन करने का ही काम किया। डॉ. दिलीप कुमार सिंह को लाइफ मेंबर आफ इंडियन मेडिकल एसोसिएशन एंड लेप्रोसी फाउडेशन, वर्धा, डेलीगेट ऑफ वल्र्ड मेडिकल एसेम्बली, म्यूनिक, जर्मनी, सिस्टर कौरोल हस्स अवार्ड एवं पंचशील शिरोमणि अवार्ड सहित कई पुरस्कार उन्हें मिल चुके हैं।

डॉ. दिलीप कुमार सिंह ने अपने कार्यों से लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाई है। अपने काम के प्रति उनकी ईमानदारी और प्रतिबद्धता आज लाखों लोगों के लिए उन्हें प्रेरणास्त्रोत (Inspiration) बनाती है। डॉ. दिलीप कुमार सिंह की सफलता की कहानी (Success Story of Dr. Dilip Kumar Singh) सही मायने में लाखों लोगों को प्रेरित करती है।

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आपको ये “बिहार के मशहूर डॉ. दिलीप कुमार सिंह की जीवन की कहानी आपको कैसी लगी ये निचे कमेंट करके जरूर बताएं। और BiharJournal.com पर किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, अपना राय जरूर दें।

Written by BJ Staff

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