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50+ Dushyant Kumar Hindi Poems, Ghazal & Shayari

Dushyant Kumar Poems in Hindi

आज हम आपके लिए दुष्यंत कुमार के लोकप्रिय कविताएं, मशहूर शे’र-ओ-शायरी, और चुनिंदा ग़ज़लें (Dushyant Kumar Poems in Hindi, Famous Shayari, & Ghazal) चुन कर लाएँ हैं ताकि आप भी इस महान शायर की प्रतिभा से रु-ब-रु हो सकें !

Dushyant Kumar Poems in Hindi | दुष्यंत कुमार की प्रसिद्ध कविताएं

दुष्यंत कुमार की कविताएँ अद्वितीय रूपकों में जीवन और मानव अनुभव की वास्तविकता का वर्णन करती हैं। पेश है उनकी प्रसिद्ध कविताएं।

चारों ओर समस्याएँ हैं, निराशाएँ हैं। हम उनके साथ कैसे व्यवहार करते हैं? पेश है दुष्यंत कुमार की एक मशहूर कविता “मत कहो, आकाश में कोहरा घना है”, गुप्त कार्यों की आलोचना, जो सीधे व्यक्ति करने में असमर्थ हैं, अंतिम छंद में बहुत खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है।

मत कहो – Dushyant Kumar Poems in Hindi

मत कहो, आकाश में कोहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है ।

सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,
क्या करोगे, सूर्य का क्या देखना है ।

इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है ।

पक्ष औ’ प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,
बात इतनी है कि कोई पुल बना है

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है ।

हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है ।

दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में संभावना है ।


देर-सबेर हम सभी जीवन में समझौता कर लेते हैं। देर-सबेर, आदर्शवाद यथार्थवाद का मार्ग प्रशस्त करता है। पेश है दुष्यंत कुमार जी की एक सुंदर कविता

अब तो पथ यही है | Dushyant Kumar Hindi Kavita

जिंदगी ने कर लिया स्वीकार,
अब तो पथ यही है।

अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है,
एक हलका सा धुंधलका था कहीं, कम हो चला है,
यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,
क्यों करूँ आकाश की मनुहार ,
अब तो पथ यही है ।

क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,
एक समझौता हुआ था रौशनी से, टूट जाए,
आज हर नक्षत्र है अनुदार,
अब तो पथ यही है।

यह लड़ाई, जो की अपने आप से मैंने लड़ी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है,
यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार,
अब तो पथ यही है।


जिंदगी के ढोल-नगाड़ों में कभी-कभी कोई आ जाता है और अचानक जोश आ जाता है। चीजें उलटी हो जाती हैं, लेकिन कौन परवाह करता है! पेश है दुष्यंत कुमार की एक प्यारी सी कविता। कविता मुझे फिल्म “कथा” के गीत “कौन आया” की याद दिलाती है।

कौन यहाँ आया था | Dushyant Kumar Poem

कौन यहाँ आया था कौन दिया बाल गया
सूनी घर-देहरी में ज्योति-सी उजाल गया

पूजा की बेदी पर गंगाजल भरा कलश
रक्खा था, पर झुक कर कोई कौतुहलवश
बच्चों की तरह हाथ डाल कर खंगाल गया

आँखों में तिरा आया सारा आकाश सहज
नए रंग रँगा थका-हारा आकाश सहज
पूरा अस्तित्व एक गेंद-सा उछाल गया

अधरों में राग, आग अनमनी दिशाओं में
पार्श्व में, प्रसंगों में व्यक्ति में, विधाओं में
साँस में, शिराओं में पारा-सा ढाल गया।


दुष्यंत कुमार की कविताएँ अद्वितीय रूपकों में जीवन और मानव अनुभव की वास्तविकता का वर्णन करती हैं। पेश है उनकी एक और प्रसिद्ध कविता। मेरा पसंदीदा छंद चौथा है। सच्चे लोगों को जीवन में पीछे धकेल दिया जाता है जबकि नकली लोग आगे की ओर धकेल देते हैं।


यह क्यों ? – दुष्यंत कुमार की कविता

हर उभरी नस मलने का अभ्यास
रुक रुककर चलने का अभ्यास
छाया में थमने की आदत
यह क्यों ?

जब देखो दिल में एक जलन
उल्टे उल्टे से चाल-चलन
सिर से पाँवों तक क्षत-विक्षत
यह क्यों ?

जीवन के दर्शन पर दिन-रात
पण्डित विद्वानों जैसी बात
लेकिन मूर्खों जैसी हरकत
यह क्यों ?


आवाज़ों के घेरे – दुष्यन्त कुमार कविता

आवाज़ें…
स्थूल रूप धरकर जो
गलियों, सड़कों में मँडलाती हैं,
क़ीमती कपड़ों के जिस्मों से टकराती हैं,
मोटरों के आगे बिछ जाती हैं,
दूकानों को देखती ललचाती हैं,
प्रश्न चिह्न बनकर अनायास आगे आ जाती हैं-
आवाज़ें !
आवाज़ें, आवाज़ें !!

मित्रों !
मेरे व्यक्तित्व
और मुझ-जैसे अनगिन व्यक्तित्वों का क्या मतलब ?
मैं जो जीता हूँ
गाता हूँ
मेरे जीने, गाने
कवि कहलाने का क्या मतलब ?
जब मैं आवाज़ों के घेरे में
पापों की छायाओं के बीच
आत्मा पर बोझा-सा लादे हूँ;


Dushyant Kumar Shayari | दुष्यंत कुमार के शेर

दुष्यंत कुमार को हिंदी ग़ज़लों का प्रणेता माना जाता है, उन्होंने अपनी ग़ज़लों के माध्यम से आम लोगों की पीड़ा को सरल शब्दों में व्यक्त किया है। उर्दू के अलावा हिंदी में ग़ज़ल कहने का तरीका अपने आप में नया था, जिसे दुष्यंत कुमार ने न केवल रचा बल्कि उसे लोकप्रिय भी बनाया। पेश हैं दुष्यंत कुमार की उन्हीं ग़ज़लों के कुछ चुनिंदा शेर. (Top 10 Famous Shayari of Dushyant Kumar)

दुष्यंत कुमार शेर
Dushyant Kumar Famous Shayari

कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीअ’त से उछालो यारो


Dushyant Kumar Ghazal in Hindi

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए


दुष्यंत कुमार हिंदी शायरी
Dushyant Kumar Love Shayari

एक आदत सी बन गई है तू
और आदत कभी नहीं जाती


Dushyant Kumar Quotes
Dushyant Kumar Shayari on Love

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दोहरा हुआ होगा
मैं सज्दे में नहीं था आप को धोका हुआ होगा


Dushyant Kumar Motivational Quotes

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए


Dushyant Kumar Motivational Shayari

न हो क़मीज़ तो पाँव से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए


Dushyant Kumar Poems

यहाँ तक आते आते सूख जाती है कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा


नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं
ज़रा सी बात है मुँह से निकल न जाए कहीं


तुम्हारे पावँ के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं


तिरा निज़ाम है सिल दे ज़बान-ए-शायर को
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए


Dushyant Kumar Ghazal | दुष्यंत कुमार की गजलें

निदा फाजली साहब ने कहा, “दुष्यंत कुमार अपने दौर के नए युवाओं की आवाज हैं।” दुष्यंत कुमार ने अपनी ग़ज़लों से क्रांति ला दी थी, उनकी रचनाएँ ही वह संचार थीं जो समाज के पिछड़े वर्गों को जागरूक करती थीं। पेश है दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें…

मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ | Dushyant Kumar Hindi Ghazal

मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आप को सुनाता हूँ

एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ

तू किसी रेल सी गुज़रती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ

हर तरफ़ एतराज़ होता है
मैं अगर रौशनी में आता हूँ

एक बाज़ू उखड़ गया जब से
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ

मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ

कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ


ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो | Dushyant Kumar Famous Ghazal

ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो
अब कोई ऐसा तरीक़ा भी निकालो यारो

दर्द-ए-दिल वक़्त को पैग़ाम भी पहुँचाएगा
इस कबूतर को ज़रा प्यार से पालो यारो

लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे
आज सय्याद को महफ़िल में बुला लो यारो

आज सीवन को उधेड़ो तो ज़रा देखेंगे
आज संदूक़ से वे ख़त तो निकालो यारो

रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया
इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो

कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

लोग कहते थे कि ये बात नहीं कहने की
तुम ने कह दी है तो कहने की सज़ा लो यारो


हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए | Dushyant Kumar Hindi Ghazal

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज ये दीवार पर्दों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर हर गली में हर नगर हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मिरा मक़्सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए


ये ज़बाँ हम से सी नहीं जाती | Dushyant Kumar Hindi Ghazal

ये ज़बाँ हम से सी नहीं जाती
ज़िंदगी है कि जी नहीं जाती

इन फ़सीलों में वो दराड़ें हैं
जिन में बस कर नमी नहीं जाती

देखिए उस तरफ़ उजाला है
जिस तरफ़ रौशनी नहीं जाती

शाम कुछ पेड़ गिर गए वर्ना
बाम तक चाँदनी नहीं जाती

एक आदत सी बन गई है तू
और आदत कभी नहीं जाती

मय-कशो मय ज़रूरी है लेकिन
इतनी कड़वी कि पी नहीं जाती

मुझ को ईसा बना दिया तुम ने
अब शिकायत भी की नहीं जाती


कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं | Dushyant Kumar Hindi Ghazal

कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं

वो सलीबों के क़रीब आए तो हम को
क़ायदे क़ानून समझाने लगे हैं

एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है
जिस में तह-ख़ानों से तह-ख़ाने लगे हैं

मछलियों में खलबली है अब सफ़ीने
इस तरफ़ जाने से कतराने लगे हैं

मौलवी से डाँट खा कर अहल-ए-मकतब
फिर उसी आयात को दोहराने लगे हैं

अब नई तहज़ीब के पेश-ए-नज़र हम
आदमी को भून कर खाने लगे हैं


नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं | Dushyant Kumar Hindi Ghazal

नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं
जरा-सी बात है मुँह से निकल न जाए कहीं

वो देखते है तो लगता है नींव हिलती है
मेरे बयान को बंदिश निगल न जाए कहीं

यों मुझको ख़ुद पे बहुत ऐतबार है लेकिन
ये बर्फ आंच के आगे पिघल न जाए कहीं

चले हवा तो किवाड़ों को बंद कर लेना
ये गरम राख़ शरारों में ढल न जाए कहीं

तमाम रात तेरे मैकदे में मय पी है
तमाम उम्र नशे में निकल न जाए कहीं

कभी मचान पे चढ़ने की आरज़ू उभरी
कभी ये डर कि ये सीढ़ी फिसल न जाए कहीं

ये लोग होमो-हवन में यकीन रखते है
चलो यहां से चलें, हाथ जल न जाए कहीं


आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख | Hindi Ghazal of Dushyant Kumar

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
पर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख ।

एक दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ,
आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख ।

अब यकीनन ठोस है धरती हक़ीक़त की तरह,
यह हक़ीक़त देख लेकिन ख़ौफ़ के मारे न देख ।

वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख ।

ये धुन्धलका है नज़र का तू महज़ मायूस है,
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख ।

राख़ कितनी राख़ है, चारों तरफ बिख़री हुई, 
राख़ में चिनगारियाँ ही देख अंगारे न देख ।


वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है – Dushyant Kumar Ghazal

वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है
माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है

वे कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू
मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है

सामान कुछ नहीं है फटे-हाल है मगर
झोले में उस के पास कोई संविधान है

उस सर-फिरे को यूँ नहीं बहला सकेंगे आप
वो आदमी नया है मगर सावधान है

फिस्ले जो उस जगह तो लुढ़कते चले गए
हम को पता नहीं था कि इतना ढलान है

देखे हैं हम ने दौर कई अब ख़बर नहीं
पावँ तले ज़मीन है या आसमान है

वो आदमी मिला था मुझे उस की बात से
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बे-ज़बान है


एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है | Dushyant Kumar Ghazal

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है
आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए
यह हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यों कहो
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है

मस्लहत-आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम
तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है

इस क़दर पाबन्दी-ए-मज़हब कि सदक़े आपके
जब से आज़ादी मिली है मुल्क़ में रमज़ान है

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है

मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है


Dushyant Kumar Poetry Books

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Written by साहित्य जर्नल

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