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10+ महादेवी वर्मा जी की श्रेष्ठ कविताएं

Top 10 Poem of Mahadevi Verma

महादेवी वर्मा जी की सबसे श्रेष्ठ कविताएं (Best Poems of Mahadevi Verma) ढूंढ रहे हैं? अगर हाँ, तो इस पोस्ट के माध्यम से हम महादेवी वर्मा की श्रेष्ठ कविताओं का संग्रह (Mahadevi Verma Poems) पेश कर रहे हैं ।

वैसे तो वर्मा जी की सभी कविताएं श्रेष्ठ होती है और हम साहित्य प्रेमियों को बहुत कुछ सीखाती है, लेकिन हम उनकी सभी कविताएं इस पोस्ट में नहीं शेयर कर रहे हैं, इसलिए कुछ ही कविताएं आपको यहां पढ़ने को मिलेंगे।

अगर महादेवी वर्मा जी की कविताएं पसंद आये तो साहित्य प्रेमियों को इसे पढ़ने के लिए उन तक पहुचाएं यानि सभी सोशल मीडिया जैसे की Facebook, WhatsApp और Instagram पर शेयर करें।

Mahadevi Verma Poems Collection in Hindi


Jaag Tujhko Dur Jana Mahadevi Verma Motivational Poem

इस जीवन-पथ में असंख्य कठिनाइयों, विकर्षणों और सांसारिक मोहों के बावजूद चलते रहना पड़ता है। पेश है महादेवी वर्मा की जाग तुझको दूर जाना! कविता

1. जाग तुझको दूर जाना | Jaag Tujhko Door Jaana

चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!
जाग तुझको दूर जाना!

अचल हिमगिरि के हॄदय में आज चाहे कम्प हो ले!
या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;
आज पी आलोक को ड़ोले तिमिर की घोर छाया
जाग या विद्युत शिखाओं में निठुर तूफान बोले!
पर तुझे है नाश पथ पर चिन्ह अपने छोड़ आना!
जाग तुझको दूर जाना!

बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले?
पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले?
विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
क्या डुबो देंगे तुझे यह फूल दे दल ओस गीले?
तू न अपनी छाँह को अपने लिये कारा बनाना!
जाग तुझको दूर जाना!

वज्र का उर एक छोटे अश्रु कण में धो गलाया,
दे किसे जीवन-सुधा दो घँट मदिरा माँग लाया!
सो गई आँधी मलय की बात का उपधान ले क्या?
विश्व का अभिशाप क्या अब नींद बनकर पास आया?
अमरता सुत चाहता क्यों मृत्यु को उर में बसाना?
जाग तुझको दूर जाना!

कह न ठंढी साँस में अब भूल वह जलती कहानी,
आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;
हार भी तेरी बनेगी माननी जय की पताका,
राख क्षणिक पतंग की है अमर दीपक की निशानी!
है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियां बिछाना!
जाग तुझको दूर जाना!


पेश है महादेवी वर्मा की एक और प्रसिद्ध कविता (Famous poem of Mahadevi Varma)

2. धूप सा तन दीप सी मैं | Dhoop Sa Tan Deep Si Main

धूप सा तन दीप सी मैं!

उड़ रहा नित एक सौरभ-धूम-लेखा में बिखर तन,
खो रहा निज को अथक आलोक-सांसों में पिघल मन
अश्रु से गीला सृजन-पल,
औ’ विसर्जन पुलक-उज्ज्वल,
आ रही अविराम मिट मिट
स्वजन ओर समीप सी मैं!

सघन घन का चल तुरंगम चक्र झंझा के बनाये,
रश्मि विद्युत ले प्रलय-रथ पर भले तुम श्रान्त आये,
पंथ में मृदु स्वेद-कण चुन,
छांह से भर प्राण उन्मन,
तम-जलधि में नेह का मोती
रचूंगी सीप सी मैं!

धूप-सा तन दीप सी मैं!


Adhikaar Mahadevi Verma Heart touching Poem

जो दूसरों के लिए अथक प्रयास करते हैं वे नष्ट हो सकते हैं, लेकिन यहां महादेवी वर्मा कहती हैं कि वह भगवान की कृपा से अमर होने के बजाय उस पीड़ा को पसंद करेंगी। पंक्तियों का सटीक अर्थ जानने के लिए अल्पविराम पर रुकने के लिए सावधान रहें।

3. अधिकार – महादेवी वर्मा | Adhikar

वे मुस्काते फूल,
नहीं जिनको आता है मुर्झाना,
वे तारों के दीप,
नहीं जिनको भाता है बुझ जाना।

वे नीलम के मेघ,
नहीं जिनको है घुल जाने की चाह,
वह अनन्त रितुराज,
नहीं जिसने देखी जाने की राह।

वे सूने से नयन,
नहीं जिनमें बनते आँसू मोती,
वह प्राणों की सेज,
नहीं जिसमें बेसुध पीड़ा सोती।

ऐसा तेरा लोक,
वेदना नहीं, नहीं जिसमें अवसाद,
जलना जाना नहीं,
नहीं जिसने जाना मिटने का स्वाद!

क्या अमरों का लोक मिलेगा
तेरी करुणा का उपहार?
रहने दो हे देव!
अरे! यह मेरा मिटने का अधिकार!


Murjhaya Fool - Mahadevi Verma Poem On Life

दुनिया आपको तब तक प्यार करती है जब तक आपके पास दुनिया को देने के लिए कुछ है। उसके बाद आपको भुला दिया जाता है। महादेवी वर्मा जी की इस मुरझाया फूल कविता में इस कड़वे सत्य का लाक्षणिक रूप से वर्णन किया गया है।

4. मुरझाया फूल (महादेवी वर्मा) | Murjhaya Phool

था कली के रूप शैशव-
में अहो सूखे सुमन,
मुस्कराता था, खिलाती
अंक में तुझको पवन !

खिल गया जब पूर्ण तू-
मंजुल सुकोमल पुष्पवर,
लुब्ध मधु के हेतु मँडराते
लगे आने भ्रमर !

स्निग्ध किरणें चन्द्र की-
तुझको हँसाती थीं सदा,
रात तुझ पर वारती थी
मोतियों की सम्पदा !


यहाँ महादेवी वर्मा की तीव्र लालसा की एक प्यारी कविता है। जो तुम आ जाते एक बार तो सब कुछ कैसे बदल जाएगा ।

5. जो तुम आ जाते एक बार | Jo Tum Aa Jaate Ek Bar

जो तुम आ जाते एक बार

कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग

आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार

हँस उठते पल में आर्द्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग

आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार


दुनिया भ्रम से भरी है जो अंततः सत्य की प्राप्ति में बदल जाती है। इस मधुर कविता में महादेवी वर्मा जी जीवन के इस तथ्य के अनेक रूपक देती हैं।

6. मै अनंत पथ में लिखती जो | Mahadevi Verma Short Poem

मै अनंत पथ में लिखती जो
सस्मित सपनों की बाते
उनको कभी न धो पायेंगी
अपने आँसू से रातें!

उड़् उड़ कर जो धूल करेगी
मेघों का नभ में अभिषेक
अमिट रहेगी उसके अंचल-
में मेरी पीड़ा की रेख!

तारों में प्रतिबिम्बित हो
मुस्कायेंगी अनंत आँखें,
हो कर सीमाहीन, शून्य में
मँडरायेगी अभिलाषें!

वीणा होगी मूक बजाने-
वाला होगा अंतर्धान,
विस्मृति के चरणों पर आ कर
लौटेंगे सौ सौ निर्वाण!

जब असीम से हो जायेगा
मेरी लघु सीमा का मेल,
देखोगे तुम देव! अमरता
खेलेगी मिटने का खेल!


महादेवी वर्मा जी की एक बहुत ही प्रसिद्ध कविता मधुर-मधुर मेरे दीपक जल! जो दीपक को लौ को जलते रहने के लिए प्रोत्साहित करती है ताकि प्रेम का मार्ग हमेशा प्रकाशमय रहे.

7. मधुर मेरे दीपक जल | Madhur Madhur Mere Deepak Jal

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!
युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल
प्रियतम का पथ आलोकित कर!

सौरभ फैला विपुल धूप बन
मृदुल मोम-सा घुल रे, मृदु-तन!
दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित,
तेरे जीवन का अणु गल-गल
पुलक-पुलक मेरे दीपक जल!

तारे शीतल कोमल नूतन
माँग रहे तुझसे ज्वाला कण;
विश्व-शलभ सिर धुन कहता मैं
हाय, न जल पाया तुझमें मिल!
सिहर-सिहर मेरे दीपक जल!

जलते नभ में देख असंख्यक
स्नेह-हीन नित कितने दीपक
जलमय सागर का उर जलता;
विद्युत ले घिरता है बादल!
विहँस-विहँस मेरे दीपक जल!

द्रुम के अंग हरित कोमलतम
ज्वाला को करते हृदयंगम
वसुधा के जड़ अन्तर में भी
बन्दी है तापों की हलचल;
बिखर-बिखर मेरे दीपक जल!

मेरे निस्वासों से द्रुततर,
सुभग न तू बुझने का भय कर।
मैं अंचल की ओट किये हूँ!
अपनी मृदु पलकों से चंचल
सहज-सहज मेरे दीपक जल!

सीमा ही लघुता का बन्धन
है अनादि तू मत घड़ियाँ गिन
मैं दृग के अक्षय कोषों से-
तुझमें भरती हूँ आँसू-जल!
सहज-सहज मेरे दीपक जल!

तुम असीम तेरा प्रकाश चिर
खेलेंगे नव खेल निरन्तर,
तम के अणु-अणु में विद्युत-सा
अमिट चित्र अंकित करता चल,
सरल-सरल मेरे दीपक जल!

तू जल-जल जितना होता क्षय;
यह समीप आता छलनामय;
मधुर मिलन में मिट जाना तू
उसकी उज्जवल स्मित में घुल खिल!
मदिर-मदिर मेरे दीपक जल!
प्रियतम का पथ आलोकित कर!


पेश है महादेवी वर्मा की एक प्रसिद्ध कविता का अंश। ‘कौन तुम मेरे हृदय में’ प्यार दिल में बस जाता है और अचानक दुनिया कितनी अलग दिखती है!

8. कौन तुम मेरे हृदय में | Kaun tum mere hriday main

कौन मेरी कसक में नित,
मधुरता भरता अलक्षित?
कौन प्यासे लोचनों में,
घुमड़ घिर झरता अपरिचित?

स्वर्ण-स्वप्नों का चितेरा,
नींद के सूने निलय में!
कौन तुम मेरे हृदय में?

अनुसरण नि:श्वास मेरे,
कर रहे किसका निरन्तर?
चूमने पदचिह्न किसके,
लौटते यह श्वास फिर फिर!

कौन बन्दी कर मुझे अब,
बँध गया अपनी विजय में?
कौन तुम मेरे हृदय में?

एक करूण अभाव में चिर-
तृप्ति का संसार संचित,
एक लघु क्षण दे रहा,
निर्वाण के वरदान शत शत!

पा लिया मैंने किसे इस,
वेदना के मधुर क्रय में?
कौन तुम मेरे हृदय में?

गूँजता उर में न जाने
दूर के संगीत सा क्या?
आज खो निज को मुझे,
खोया मिला, विपरीत सा क्या?

क्या नहा आई विरह-निशि,
मिलन-मधु-दिन के उदय में?
कौन तुम मेरे हृदय में?

तिमिर-पारावार में,
आलोक-प्रतिमा है अकम्पित,
आज ज्वाला से बरसता,
क्यों मधुर घनसार सुरभित?

सुन रहीं हूँ एक ही,
झंकार जीवन में, प्रलय में?
कौन तुम मेरे हृदय में?

मूक सुख दु:ख कर रहे,
मेरा नया श्रृंगार सा क्या?
झूम गर्वित स्वर्ग देता –
नत धरा को प्यार सा क्या?

आज पुलकित सृष्टि क्या,
करने चली अभिसार लय में,
कौन तुम मेरे हृदय में?


9. संसार | Sansar Mahadevi Verma Poem

संसार 

निश्वासों का नीड़, निशा का
बन जाता जब शयनागार,
लुट जाते अभिराम छिन्न
मुक्तावलियों के बन्दनवार,

तब बुझते तारों के नीरव नयनों का यह हाहाकार,
आँसू से लिख लिख जाता है ’कितना अस्थिर है संसार’!

हँस देता जब प्रात, सुनहरे
अंचल में बिखरा रोली,
लहरों की बिछलन पर जब
मचली पड़तीं किरनें भोली,

तब कलियाँ चुपचाप उठाकर पल्लव के घूँघट सुकुमार,
छलकी पलकों से कहती हैं ’कितना मादक है संसार’!

देकर सौरभ दान पवन से
कहते जब मुरझाये फूल,
’जिसके पथ में बिछे वही
क्यों भरता इन आँखों में धूल’?

’अब इनमें क्या सार’ मधुर जब गाती भँवरों की गुंजार,
मर्मर का रोदन कहता है ’कितना निष्ठुर है संसार’!

स्वर्ण वर्ण से दिन लिख जाता
जब अपने जीवन की हार,
गोधूली, नभ के आँगन में
देती अगणित दीपक बार,

हँसकर तब उस पार तिमिर का कहता बढ बढ पारावार,
’बीते युग, पर बना हुआ है अब तक मतवाला संसार!’

स्वप्नलोक के फूलों से कर
अपने जीवन का निर्माण,
’अमर हमारा राज्य’ सोचते
हैं जब मेरे पागल प्राण,

आकर तब अज्ञात देश से जाने किसकी मृदु झंकार,
गा जाती है करुण स्वरों में ’कितना पागल है संसार!’


यहाँ महादेवी वर्मा जी की एक प्यारी सी कविता है जिसे आप बस प्रवाहित कर सकते हैं। कृपया इसे कुछ बार पढ़ें और जोर से पढ़ें, और इसका जादू देखें! कुछ कठिन शब्दों के अर्थ नीचे दिए गए हैं

10. नींद में सपना बन अज्ञात | Mahadevi Verma Love Poem

नींद में सपना बन अज्ञात !
गुदगुदा जाते हो जब प्राण,
ज्ञात होता हँसने का अर्थ
तभी तो पाती हूं यह जान,

प्रथम छूकर किरणों की छाँह
मुस्कुराती कलियाँ क्यों प्रात,
समीरण का छूकर चल छोर
लोटते क्यों हँस हँस कर पात !

प्रथम जब भर आतीं चुप चाप
मोतियों से आँखें नादान
आँकती तब आँसू का मोल
तभी तो आ जाता यह ध्यान,

घुमड़ फिर क्यों रोते नब मेघ
रात बरसा जाती क्यों ओस,
पिघल क्यों हिम का उर अवदात
भरा करता सरिता के कोष !

मधुर अपने स्पंदन का राग
मुझे प्रिय जब पड़ता पहिचान !
ढूंढती तब जग में संगीत
प्रथम होता उर में यह भान,

विचियों पर गा करुण विहाग
सुनाता किसको पारावार,
पथिक सा भटका फिरता वात
लिये बयों स्वरलहरी का भार !

हृदय में खिल कलिका सी चाह
दृगों को जब देती मधुदान,
छलक उठता पुलकों से गात
जान पाता तब मन अनजान,

गगन में हँसता देख मयंक
उमड़ती बयों जलराशी अपार,
पिघल चलते विधुमणी के प्राण
रश्मियां छूते ही सुकुमार !

देख वारिद की धूमिल छाँह
शिखी शावक होता क्यों भ्रांत,
शलभ कुल नित ज्वाला से खेल
नहीं फिर भी क्यों होता श्रांत!

  • समीरण – हवा
  • विचियां – लहरें
  • बात – वायु
  • मयंक – चांद
  • बारिद – बादल
  • शिखी – मोर
  • शलभ – पतंगा

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Written by साहित्य जर्नल

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