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मैं माटी हूँ इस पटना की, तुम साथ अपने मुझे बहा लेना।

Hindi Poem on Bihar

प्रिय स्नेहजनों,
काफी दिनों से एक इच्छा थी। अपने मातृभूमि, अपने माटी के लिए यानि Poem on Bihar लिख सकूँ। मेरा जन्म बिहार में हुआ है और ज़िन्दगी में आज जो कुछ भी हूँ, इस बिहार के वजह से ही हूँ। पटना से एक विशेष लगाव है। यहाँ की धरती मेरी कर्मभूमि है । हर एक गली और हर एक चौराहा अपना सा लगता है। बहुत करीब से इस शहर को मैंने समझा है।

अक्सर मैं गंगा के तट पर बैठता था और गंगा की तेज धारा मुझे अपनी व्यथा सुनाती थी। आज एक प्रयास किया हूँ Bihar Par Kavita के माध्यम से बिहार को आप सभी से रूबरू करवाने का।


मैं माटी हूँ इस पटना की, तुम साथ अपने मुझे बहा लेना।

पाप की गठरी अब भर चुकी, गंगा में आकर नहा लेना।
मैं माटी हूँ इस पटना की, तुम साथ अपने मुझे बहा लेना।

जब सत्ता की लफ्फाज़ी से गरीब भी सपने बुन लेता।
मैं गाँधी मैदान सा खामोश रहकर, हर झूठ सुन लेता।
तुम जय श्री राम बोलते हो, वो इंशाल्लाह की धुन देता।
मैं महावीर मंदिर सा पावन हूँ, हर बार अज़ान सुन लेता।

पैसेंजर ट्रेन से प्रदेश जाकर, तुम जब खूब पैसे कमा लेना।
मैं माटी हूँ इस पटना की, तुम साथ अपने मुझे बहा लेना।

उम्मीद करूँ क्या दूसरों से, हर बार अपनो से हारी हूँ।
फिर भी कभी धैर्य न खोया, मैं बापूधाम मोतिहारी हूँ।
कोई बिहारी कहकर अपमान करे, तुम बस मुस्कुरा देना।
मुज़फ़्फ़रपुर का लीची बन कर, स्वाद सबको चखा देना।

पहली तारीख को घर पैसे भेजकर, खुद को भूखे सहा लेना।
मैं माटी हूँ इस पटना की, तुम साथ मुझे अपने बहा लेना।

बड़े शहरों की अंधेरी रातों में, अपने संस्कार बचा लेना।
पिज्जा-बर्गर की दुनिया मे, घर का अचार भी खा लेना।
होली-दीवाली अकेले तुम, बिना घर आये तुम मना लेना।
छठ पर्व जब भी पुकारे, तुम बिना रुके घर को आ लेना।

जब गाँव आकर परदेश से, तुम भी बड़े बाबू कहवा लेना।
मैं माटी हूँ इस पटना की, तुम साथ अपने मुझे बहा लेना।


Vihaan आशा करते है की ये कविता आपको जरूर पसंद आया होगा। अगर आपको ये ‘Poem on Bihar – मैं माटी हूँ इस पटना की, तुम साथ अपने मुझे बहा लेना।’ कविता दिल से पसंद आ ही गया है तो फिर देरी किस बात की है दोस्तों और परिवारों में इस कविता को शेयर कीजिये।

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Vihaan

Written by साहित्य जर्नल

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