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Poem on Life Cycle – मैं खुद को भूल जाता था…

Poem on Life Cycle

Poem on Life Cycle: दोस्तों आज के इस पोस्ट में बेहतरीन जिन्दगी पर आधारित कविता दिया गया हैं. जीवन को देखते हुए यह Hindi Poems on Life कविता लिखा गया हैं ये छोटे शब्दो में ही हमें जिन्दगी की असलियत और अहमियत को बेहतरीन तरीके से दर्शाती हैं.

उम्र जीवन के साथ-साथ चलने वाला वो साथी हैं, जो वक़्त के हर पड़ाव पे एक नया प्रयास और नया अनुभव सिखा जाता हैं..

मैं खुद को भूल जाता था… (Poem About Stages of Life)

बचपन बेहद निराला था, गाँव-घर का प्यारा था…
बीत गया वो पल पुराना, जिस उम्र ने हमको सवारा था..
कभी हँसता तो कभी रोता, हर बात पे अपनी नौटंकी करता था..
खेलने की जिद मे हमेशा, मैं खुद को भूल जाता था..

उम्र का वो भी दौर आया, भविष्य की फिक्र ने पढ़ना सिखाया था..
शिक्षक से ज्यादा परीक्षा ने डराया, फेल होने के डर ने रात भर जगाया था..
किताबों की बोझ और दोस्तों की शोर मे, कुछ ख़्वाब हमने भी जगाया था..
नये-पुराने सपनो के बीच हमेशा, मैं खुद को भूल जाता था..

मेरा भी अब वो समय आया, नौकरी को हमने पहला हमसफर बनाया..
बीते पल की आज़ादी अब पुराना था, सीनियर की गुलामी मे हमेशा जो मुस्कराना था..
जरूरतों की सीमा पार करने मे, कई ख्वाब दूर पीछे छूट जाता था..
परिवार की खुशियाँ लाते- लाते, मैं खुद को भूल जाता था..

ढ़लते शाम की तरह उम्र भी ढल गया, जवानी भी दूर किसी कोने मे छिप गया था..
अब याद कर के अपना बचपन मुश्कुराता, कैसे मैं पढ़ते-खेलते दादा जी के पास सो जाता था..
कई नये रिश्तो की भीड़ मे, अक्सर अब मैं अकेला हो जाता था..
बचे हुए साँसों को संभाल कर, मैं खुद को भूल जाता था..

Poem on Life Cycle – मैं खुद को भूल जाता था… ये कविता आपको कैसा लगा और साथ ही कोई सवाल या सुझाव हो तो निचे कमेंट में जरूर बताएं।

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Written by साहित्य जर्नल

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