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रोजगार- एक सफर । By Deepak Upadhyay

Employment Poetry in Hindi by By Deepak Upadhyay

नही होता कोई अपना, एक अंजान शहरो मे..
अपनो के लिए, अंजान बने चले आते है..

आँखो मे सपने और कंधो पे थोड़ी जिम्मेदारी लिए..
घर से दूर, रोजगार के लिए चले आते है..

संघर्ष मे शुरुआत करते है..
धीरे-धीरे अपनी ज़रूरते पुरी करते जाते है..

समाज मे अपनी एक नई पहचान बनाने..
घर से दूर, रोजगार के लिए चले आते है..

परिवार की हर खुशीयों को पुरा करने के लिए..
गाँव को भूल के, शहरों मे खो जाते है..

जिंदगी की दौड़ मे अपना परचम लहराने..
घर से दूर, रोजगार के लिए चले आते है..

Written By: Deepak Upadhyay

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2 Comments

Written by साहित्य जर्नल

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